जब न्याय विवेक का गुलाम बन जाए — तब नागरिक कैसे सुरक्षित रहेगा?
जब न्याय विवेक का गुलाम बन जाए — तब नागरिक कैसे सुरक्षित रहेगा?
भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में जमानत (Bail) कोई मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक न्यायिक विवेकाधीन प्रक्रिया है। संविधान मौलिक अधिकार देता है, लेकिन जब कोई नागरिक एक झूठे या संदेहास्पद मुकदमे में फँसता है, तो उसे ज़मानत मिलना — जज के विवेक पर निर्भर करता है।
👉 कोई स्पष्ट कानून नहीं — सिर्फ सिद्धांत हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों में विकसित किया है:
🔹 अभियुक्त का आपराधिक इतिहास,
🔹 मामला प्रथम दृष्टया कितना सशक्त है,
🔹 समाज पर प्रभाव,
🔹 अभियुक्त के फरार होने की संभावना,
🔹 साक्ष्य से छेड़छाड़ की संभावना, आदि।
परंतु दुर्भाग्यवश, जब इन्हीं सिद्धांतों का पालन करते हुए एक न्यायाधीश जमानत देता है — तो ठीक वैसी ही परिस्थितियों में दूसरा न्यायाधीश जमानत खारिज कर देता है। ऐसा क्यों?
⚠️ क्या गंभीर धारा मात्र ही जमानत को खारिज करने के लिए पर्याप्त है?
जब अभियोजन की कहानी में लेशमात्र भी सच्चाई नहीं झलकती, कोई पुख़्ता साक्ष्य नहीं होता — तब भी यदि सिर्फ़ एफआईआर में ‘गंभीर आरोप’ दर्ज है तो व्यक्ति को जेल भेज दिया जाता है।
📌 क्या न्याय का अर्थ यह नहीं कि पहले यह परखा जाए कि क्या मामला प्रथम दृष्टया विश्वसनीय है भी या नहीं?
आज की वास्तविकता यह है कि —
🛑 ज़मानत, कानून के स्पष्ट दिशा-निर्देशों से अधिक विवेक और कभी-कभी मानसिकता पर आधारित हो गई है।
🛑 और इस मनमानी का शिकार होता है — एक आम नागरिक, जिसकी स्वतंत्रता का कोई मोल नहीं समझा जाता।
🔊 समय आ गया है कि संसद और उच्चतम न्यायालय इस गहरे संकट की ओर ध्यान दें —
🔹 ज़मानत को लेकर एक व्यवस्थित, बाध्यकारी विधिक रूपरेखा तैयार की जाए।
🔹 जिससे हर न्यायाधीश एक समान मापदंड पर निर्णय दे — और नागरिक की स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति की मनोदशा का शिकार न हो।
न्याय तभी न्याय है जब वह समरूप हो, न कि संयोगवश।
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